Monday, October 11, 2010

ज़िन्दगी का सच

सच तो ये है के जीने की कोई वजह न रही
और सच ये भी है के
जिंदा रहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प न रहा

सच तो ये है के मंजिल की कोई जरुरत न रही
और सच ये भी है के
चलते रहने के अलावा मुसाफिर का कोई आसरा न रहा

सच तो ये है के हमसफ़र के मिलने को उम्मीद न रही
और सच ये भी है के
तन्हाई-ऐ-दर्द के अलावा धडकनों का कोई हम-साया न रहा

सच तो ये है के मौत से मिलने कोई चाहत न रही
और सच ये भी है के
इंतजार-ऐ-मुलाकात के अलावा "नाम" का कोई सफ़र न रहा।

अशोक "नाम"

फिर भी

जल रहा हूँ परवाने की तरह मगर
फिर भी मै जिंदा क्यों हूँ

मुस्करा रहा हूँ तन्हाई में मगर
फिर भी सीने में दर्द पिघलता क्यों है

ठहर गया हूँ सफ़र में चलते चलते मगर
फिर भी मंजिल मुझे पुकारती क्यों है

एक खवाब सोया है पलकों के किनारे मगर
फिर भी धड़कने नम होती क्यों है

कुछ फासला है दोनों के दर्मिया मगर
फिर भी नज्दिकिया सिसकती क्यों है

उतर रहा है होंठो पे काफिला यादों का मगर
फिर भी दिल गीत गुनगुनाता क्यों है

मिलता है बस एक हमसफ़र मगर
फिर भी मन मुसाफिर-सा क्यों है

खो जाना है किसी के आगोश में मगर
फिर भी तन मिटटी-सा क्यों है

हो जाना है जमी-दोस्श तुफानो से लड़ कर मगर
फिर भी शाखों पे पत्ते लगते क्यों है

होना है जुदा एक दिन दोराहे पे मगर
फिर भी लोग बिछड़ने से डरते क्यों है

कुछ भी नहीं है ज़िन्दगी में मगर
फिर भी मै सतुष्ट क्यों हूँ

एक खालीपन-सा है अहसास में मगर
फिर भी मै खुश क्यों हूँ

अशोक "नाम"

कोई

मेरी सांसो में ठहरा है कोई
मेरी पलकों पे रहता है कोई

मेरी धडकनों में पिघलता है कोई
मेरे सीने पे जलता है कोई

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वक़्त गुजरता नहीं, दर्द संवरता नहीं,
पलके महकती नहीं, धड़कने नम होती नहीं।

आप मिलते नहीं, सफ़र कटता नहीं,
सांसे थमती नहीं, ज़िन्दगी शुरू होती नहीं।

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पलकों पे दर्द महकता है,
धडकनों में तन्हाई संवारती है,
लबों पे दिल उतरता है,
सांसो में यादें घुलती है।

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बिखरी पड़ी ज़िन्दगी को
समेटते समेटते
मौत भी शामिल हो गए उसमे।

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कब निकल गए दिल से आप
हमें पता भी न चला
और पता चला जब
दूर तक आप का पता न था।

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सब कुछ छुट गया-सा क्यों लगता है,
ये दिल मुझसे खफा-सा क्यों लगता है,
मेरा हमसफ़र जुदा-सा क्यों लगता है,
'नाम' अपनों में अनजाना-सा क्यों लगता है।

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धडकनों की नाराज़गी ने रुला दिया,
आपकी ख़ामोशी ने जीना सिखा दिया,
पलकों के नमी ने हमें हंसा दिया,
"नाम" उसने किश्तों में मरना सिखा दिया।

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मेरी धडकनों को संवारता है कोई,
मेरे दर्द को पुकारता है कोई,
मेरी ज़िन्दगी को जीता है कोई,
मेरे सीने पे मरता है कोई।

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अशोक "नाम"

Tuesday, August 10, 2010

वो कौन है

सितारों ने मुस्कुरा के पूछा वो कौन है जो आपकी धडकनों में जागता है

चांदनी ने शरमा के पूछा वो कौन है जो आपकी तन्हाई को सवारता है

फूलों ने खिल के पूछा वो कौन है जो आपके लबों पे महकता है

बारिश की बूंदों ने इठला के पूछा वो कौन है जो आपकी पलकों पे बरसता है

अशोक "नाम"

मेरा दर्द

मेरा दर्द सवरने लगा तेरे आगोश में पिघलने लगा

मेरी चाहते मुस्कराने लगी तेरी धडकनों में घुलने लगी

मेरा सफ़र खोने लगा तेरे दिल पे आ के ठहरने लगा

मेरी ख़ामोशी सोने लगी तेरी पलकों पे उतरने लगी

अशोक "नाम"

Saturday, July 17, 2010

मरने न दिया

महफ़िल-ऐ-रुसवाई ने मिलने न दिया

तेरे आसुओ ने दर्द-ऐ-गम पीने न दिया

तन्हाई-ऐ-याद में जी लेते लेकिन

दुनिया-ऐ-भीड़ में तुमने मरने न दिया

अशोक "नाम"

Friday, July 16, 2010

साया


जिन्दा है मगर अपनी ही ज़िन्दगी से बे-खबर है

सफ़र में है मगर हमसफ़र से बे-खबर है

तनहा चले जा रहे है

मगर...

एक अंजन साए को साथ पाया

ठहर गए कुछ पल वक़्त गुजरने के लिए

मगर ...वो साया चलता रहा मंजिल की तरफ

सवाल ये है क उस साए की पहचान क्या लेकिन ...

आहिस्ता -आहिस्ता धड़कने लबो पे आये और हौले से कहा

"नाम" उस साए का नाम मौत है।

अशोक "नाम"